Posts

Showing posts from August, 2021

अहसास

बहुत जरूरी है रिश्तों का अहसास होना मिलना जुलना है बहुत जरूरी रिश्ते नही तो कुछ भी नहीं सुख दुख व दर्द का अहसास है बहुत जरूरी रिश्तों में... भावनाओं की कद्र करना भी है जरूरी मन की गहराइयों से अहसास रिश्तों का स्पर्श मन का मन से  रिश्तों में है बहुत छोटा सा शब्द अहसास  अर्थ व भाव बहुत गहरा होत है।। बीबी का पति से रिश्ता हो  या भाई भाई का रिश्ता हो  जीजा साली साला का रिश्ता हो बेटा व बेटी  व माँ बाप से रिश्ते हो या सास ससुर का दामाद से रिश्ता हो या सरहज से रिश्ते की बातें या चाचा चाची व दादा दादी का अहसास होना है बहुत जरूरी चाहे दूर हों या पास .. मिलना बिछड़ना फिर मिलने बिछड़ने  का ये सिलसिला रिश्तों में लाता है है जिसके लिए एक शब्द अहसास।। कभी ठहरना इस दौड़ती जिंदगी में एक पल जरूर निकलना रिश्तों खातिर शांत चित मन से गौर करना इन रिश्तों  के भित्तर के भावों व अनुभूतियों को।। हंसी मुस्कुराहट रोना तड़पना भी होता मन से रिश्तों में।। यही तो अहसास है रिश्तों का।।।

मन की शंकाएं

 मेरे गाँव मे एक इंग्लिश टीचर थे जो अब नही रहे।।बहुत सटीक उदाहरण दिया करते थे।। 'काहे कलिहा बोरा के नीचे दबाइल जातर'।।कभी कभी सोचता हूँ बड़ा सही उदाहरण था और है भी।।।बहुत समय हमलोग कुछ ऐसा काम करते है जिससे कुछ आनी जानी तो है नही या कुछ मिलनेवाला नही है फिर भी करते है पता नही क्यों।।या तो स्वभाव वश विवश है या कुछ करने की कोशिश करते है लेकिन खाली बोरा के नीचे दबने जैसी हालत में खुद को पाते है।।लेकिन मेरा मानना है इंसान को इससे हताश नही होना चाहिए।।पूरा विश्वास उस प्रभु पे रखना चाहिए जो इस जीवन को कहीं ना कही नियंत्रित करता है या एक्टिंग करवाता है हमलोगों से।।मन की साफगोई व पवित्रता बहुत मायने रखता है ऐसा मैं मानता हूं।।दूसरे लोग क्या सोचते है इससे ज्यादा जरूरी है हम क्या सोचते है खुद के बारे में।।मेरे पिताजी बचपन मे बार बार बोला करते थे हमारे स्वक्छ  विचार और अच्छे कर्म ही तो जीवन है।।जिसकी गरिमा हमलोगों को बनाये रखनी चाहिए।।बहुत समय अपने लाभ या हानि की चिंता किये बिना हमे खाली बोरा के नीचे दबने जैसे काम भी कर लेने चाहिए बशर्ते उससे हमारे कर्म किसी के लिए उद्देश्य पूरे करते हुए ...

राखी।।

 ऐ वक़्त ठहर जरा आज रक्षा बंधन है देख लूं याद कर लूं उन पलों को देख लूं अपनी बहना को कैसी है याद करने दो ऐ वक़्त उन पलों को कितनी राखियों में अपनी बहना का हाल  चाल ले पाया हूँ थोड़ा हिसाब कर लेने दो बचपन के उन पलों को थोड़ा सहेजने दो  बहुत दूर चले आये है ऐ वक़्त ।।। कैसे बहन राखी बांधती थी फिर वो मिठाइयां फिर पंडित जी की राखियां कितने मनोहर मीठे पल थे वो आज ये भाग दौड़ माया मोह की जकड़न फिर भी आज राखी है ।। ऐ वक़्त आज बक्श दो  दौड़ने भागने ना बोलो आज  केवल बहन से बात कर उन यादों को समेटने दो आज ऐ वक्त ।। ठहर जा ..रहम कर ..ना दौड़ने बोलना आज।।। दीदी कैसी हो आज राखी है मेरा प्रणाम लेना ।। दीदी आज कलाई पे तुम्हारी भेजी हुई  राखी बांध उन पलों को याद कर रहा हूँ याद है तुमको जब हम छोटे हुआ करते थे बहुत मीठी यादें आज भी तरोताजा है मन मे।।।। तब रिश्ते क्या होते है का ना था कोई ज्ञान आज जब गांव की गलियां छोड़ कंक्रीट रूपी जंगल से उन पलों को देखता हूँ जमीन व आकाश का होता अहसास है।। कैसे हम आज हो चुके बड़े है।। माया मोह की जकड़न में कितने आगे  निकल चुके है आज।।। वाह रे जीवन व...

कशमकश जीवन का

 एक वो पल और एक ये भी पल।।। मस्त बाल लीला में मग्न मुग्ध  वो महुआ का पेड़ जामुन का फल आमो के साथ बीते वो सुंदर पल कभी गुल्ली डंडा का वो खेल छुपा छुपी वो खेल  पुआल के बीच कांच की वो गोलियां दोस्तों के संग खेतों में वो बिता हुआ पल नंगे पावँ गायों को भगाता खेतों से तो कभी नीलगायों को दौड़ाता चना के खेत से वो होरहा बनाता पल जीवन के वो पल भी क्या खूब थे।।। भागती दौड़ती जिंदगी ना थी।। सुकून हुआ करता था मन मे तब।। परमेश्वर कुम्हार की वो ट्यूशन वाले पल।। तो कभी बहन के साथ झोला लेके दौड़ते आमों के बागीचे का दृश्य।।। कल की ही बात हो जैसे।।। जीवन के वो अनमोल पल।।। गमछा गले मे डाले वो पल।।।। गमछे में वो मां का दिए मुरी दाना क्रिस्चियन स्कूल डुमराव के वो पल संतोष और रविभूषण का संग सुनील जयंत और अनेको दोस्त।। सिस्टर और मिस के वो प्यारे क्लास।। दस पैसे का सफर घर से स्कूल।। वो खुसी जब वो दस पैसे बच जाते।। छोटी छोटी खुशियों के वो पल।। बाबूजी बड़का बाबूजी और चाचा का  छत्रछाया वाला डांट वाला वो पल।। एक वो पल और एक ये पल।। दौडती भागती आज के ये पल।। एक के बाद एक पल तैयार हो जैसे भागने को तैया...

भक्त चश्मा :निदान

 वैसे तो आजकल मैं साहित्य के नजरिये से खुद को या जीवन को समझने की कोशिश कर रहा हूँ।किसी भी तरह के विशेषकर राजनीतिक बहसबाजी में नही अपनी ऊर्जा खर्च करना चाहता।।जो मन मे आता है उसको लिखके मन को हल्का करने की कोशिश करता हूँ।।अपने तो भाई गृहस्थ जीवन की जिम्मेदारियों को निभाने में ही लगे है।।फिर भी आप इतना पूछ रहे है तो बोलना होगा।।मेरे हिसाब से भक्त चश्मा कहाँ से मिला है कौन दिया है ...बड़ा कठिन सवाल है।।मेरे हिसाब से पिछले कुछ सालों से स्लो जहर के रूप में ये लोगों को चुपचाप पहना दिया गया है और पहनने वाले को मालूम ही नही है ये कब कैसे या ऐसा कुछ हुआ भी है।।लेकिन इसका निदान दो तरह से संभव है।।हिन्दू मुस्लिम के सोच से या पाकिस्तान और बांग्लादेश के तुलनात्मक सोच से उप्पर उठना होगा तब दिखाई देगा कि पेट्रोल का दाम अब सौ के उप्पर हो चुका है।।बासठ प्रति लीटर पे बैलगाड़ी से चलने का ड्रामा रोड पे करनेवाले आज क्यों शांत है ये दिखाई पड़ेगा।।चार सौ में गैस महंगा दिखनेवालों को आज नौ सौ का गैस सस्ता दिखता है क्योंकि भक्त चश्मा उनको पहना दिया गया है।।एक और तरीका से ये भक्त चश्मा से निजात मिलेगा....जब इन...

भक्त चश्मा

 भक्त चश्मा...... ..ये एक चश्मा है जिसको लगाने के बाद आपको चारो ओर अच्छा ही अच्छा नजर आने लगेगा।।।रुपया का किमत 73 का चल रहा है लेकिन लगेगा अरे ये क्या ये 40 का हो गया।।पेट्रोल का कीमत 100 के उप्पर होने पर भी 40 वाला फीलिंग आएगा जो बन्दा इसको लगा लिया रहेगा।।।सरसो तेल 200 की जगह 60 का दिखेगा।।कोई मंत्री भ्रस्टाचार करता है तब भी वो देशहित में दिखाई पड़ता है....गंगा मैया के किनारे बिना अंतिम संस्कार किये लोगो की लाशें तैरती है तो भी उनको ये चमत्कार दिखता है....सभी देश वैक्सीन को स्टोर एक साल से कर रहे थे लेकिन हमारी सरकार सो रही थी फिर भी ये अद्भुत सफल मेहनती सरकार नजर आएगी।।जब बाबा रामदेव और आधुनिक विज्ञान में तुलना होगा तब बाबा सही नजर आएगा भले ही बीमार होने पे अस्पताल जाना पड़े या मजबूरी में वैक्सीन लगवाना पड़े...कोई बड़ा आपरेशन करवाना पड़े तो भी बाबा रामदेव बड़ा दिखता है  विज्ञान के सामने।। बड़ा अद्भुत चश्मा है ये जो पिछले 7 साल से सोशल मीडिया के माध्यम से या मीडिया चॅनेल्स के माध्यम से आंखों पे लगाने की कोशिश हो रही है और बहुत लोग लगा भी चुके है ...ये अलग बात है उनको पता ही नही है...

जीवन पल

 याद करो उन अनमोल पलों को प्यार मोहब्बत के किस्से व चर्चाएं एक हंसी का फुहार भी काफी था तब नयना से नयना का एक बार बात करना भी क्या किसी अजूबे से कम था।।। प्रश्नों की बौछार जरूर करना... उन फिरकापरस्तों से।। चाहे ये वाले या वो वाले कहा से लाते ये नफरत का समंदर हम तो ठहरे प्यार के वही सौदागर जो इल्लु इल्लु के गानो में आज भी खोज लेते जीवनरस व तरोताजगी।   उन काजल भरे नयनों से भी जीवन रस लेनेवाले को भला क्या वास्ता।। व्हाट्सअप यूनिवर्सिटी के नफरतियों से।। दोस्त..जरा याद कर लो कौन है हम इल्लु इल्लु का मतलब आज भी वही कल और परसो भी वही रहेगा।।

उलझन

 जीवन और कुछ भी नही प्यार का नगमा है .... रिश्तों की अनगिनत कहानी है कितने पतझड़ आये और चले गए कितनी ठंढ रातें आयी व चली गयी बचपन क्या था कहाँआ गए अब जवानी की वो प्रेम कहानियां  आज कहा होंगे वो सभी लोग नफरती कल भी थे आज भी है.. जीवन और कुछ भी नही माया मोह की अनवरत लीला है  रिश्तों की कहानी है .... दौड़ते व चलते रहने का नाम है ये जीवन....कुछ खोकर कुछ पाने  का नाम ही है जीवन।।।। ये जीवन और कुछ भी नही समय व काल चक्र का गाथा ही तो है कल कहाँ थे आज कहाँ है कल कहाँ होंगे..... काल के गाल की चक्र कहानियां ही यादों के लम्हे ही तो जीवन है.... ये जीवन और कुछ भी नही प्यार व समय की गाथाएं है।।।

द्वंद जीवन का।।

 कौन हूँ मैं ११ जन्म हुआ पला बढ़ा विद्यालय गया फिर और  बड़ा हुआ समझदार हुआ  ऐसा सभी बोले।।। प्यार व स्नेह  घर के सबों का दुख व तकलीफ भी देखा व झेला परिवार में कशमकश भी रहा रिश्तों में समय चलता रहा व जीवन भी  छोटे से बड़े होते रहे ... कब व कहाँ से कहाँ तक आ गया बेसुध व मग्न चलता रहा।। नए रिश्तों से भी मुखातिब होता रहा बचपन से जवानी में आ गया उल्टे सीधे अच्छे बुरे काम होते रहे फिर भी जीवन चलता रहा समय यूं ही बीतता गया।। पैंतालीस साल कब आ गया  समझ ही ना कभी आया।।। ये करना वो करना यही चलता रहा जीवन के भागमभाग में कभी रुकना  हुआ ही नही कभी।। समझ ही नही आया आज भी  कौन हूँ मैं.... आज रात्रि के अर्धपहरी में बिस्तर  पे बैठा यही पूछ रहा खुद से कौन हूँ मैं क्या है ये जीवन केवल अपने बच्चे अपना स्वार्थ अपनी बीबी व जरूरतें।। इसी का नाम जीवन है क्या कभी एक बहस बीबी से तो कभी एक डांट बच्चों को।। सभी अपने जीवन मे दौड़ते भागते कोई रेस चल रही हो जैसे।। इत्मीनान और शांत मन से  बात करने का भी समय ना हो जैसे अजीब विडम्बना है जीवन का।। आज भी ना समझ आया कौन हूँ मैं...

नफरत।।

 हे मानव दो हाथ पैरों वाला दो छोटी छोटी आंखों व कानो वाला एक मस्तिष्क वाला मानव क्यों इतना इतराते हो नफरत व अहंकार का गोला मन मे लिए घूमते हो।। बहुत तुक्ष है अस्तित्व तुम्हारा इस विशालकाय व अनंत ब्रम्हांड में कभी गिनती करके ही देख लो सूरज व इतने ग्रहों का आकार  रोक दिया एक अदृश्य वायरस ने  गतिमान तुम्हारे जीवन को।। फिर भी घमण्ड व इतनी नफरत लिए मन मे घूमते हो।। जीते हो जीवन केवल अपने लिए अपने बच्चे अपनी बीबी साथ मे खेलनेवाले भाई को भी पराया जैसा व्यवहार हो करते मां बाबूजी ने पाल पोष के किया  बड़ा व लायक या नालायक बनाया उनको भी केवल अपने स्वार्थ की खातिर इस्तेमाल हो करते।। फिर भी घमण्ड का गोला क्यों मन मे लिए हो घूमते।। देखो इस अनंत व विशालकाय अंतरिक्ष को ।। कर लेना तुलना उसके सामने  खुद से कभी भी जब समय मिले जवाब तुम्हे खुद को खुद से ही मिल जाएगा।। ओ नासमझ मानव इस धरती को ही कभी लेना देख ध्यान से।। वो भयानक गर्जना करता हुआ समुद्र ना बिश्वास हो देन कोई बड़ा पहाड़ ही  लेना देख अपनी छोटी छोटी आंखों से पूछ लेना वहीं अपने आप से मन मे उठते नफरत व घमण्ड को पूछ लेना क्...

लम्हे जीवन के।।

 तेरी याद आ रही है याद आ रही है वो कांच की गोलियां व गुल्ली डंडे वो लुका छुपी वाले खेल व दोस्त गांव की ऊबड़ खाबड़ गलियां गन्ना गेंहू धान के वो हरे भरे खेत मिशन स्कूल की वो यादें कक्षा पांच छह सात के वो दोस्त आती बहुत याद है उनकी  नही मिल पाए फिर कभी  वो विदाई गीत व आंसू के पल रवि भूषण पांडेय या संतोष सिंह या नीतीश जैसवाल या सुनील  वो प्रियंवदा या शालिनी चौबे कुछेक के नाम भी नही रहे अब याद कैसा ये जीवन है कितनी भागम भाग  आज कैसा सोशल मीडिया भी नही था तब।। दोस्ती की परिभाषाएं भी थी अलग आंखों को पढ़ने लेने की अजीब  ललक  तब हुआ करती थी।। वो चर्च के के भित्तर की प्रार्थना सभाएं बागवानी की कक्षाएं व मलाई बर्फ खाते वो पल..... कौन कहाँ होगा कुछ नही पता।। आंखों से आंखमिचौली करती तब  बिजली के बल्ब।। साईकल चलाके ट्यूशन जाते वो पल तिवारी जी के अंग्रेजी की कक्षाएं वही खिरौली में कॉमर्स वाले क्लास।। फिर बनारस की खट्टी मीठी यादें जनार्दन सिंह के खोंचवाँ स्कूल की  वो बेहतरीन एक साल के लम्हे कुछ दोस्तों की कहानियां आज भी  मन को कचोटती है बारम्बार।। फिर भी भ...

बुलन्द हौसले

 वीर तुम बढ़े चलो धीर तुम बढ़े चलो सामने पहाड़ हो या सामने तूफान हो सामने नफरत की दीवार हो या चारो  मन मे अग्नि अपनी मंजिल की जलाए वीर तुम चले चलो धीर तुम बढ़ते चलो ना कभी हार ना कभी रुकने का नाम हो मन मे।।। निडर होकर दहाड़ते हुए चलते चलो प्रेम को हथियार बनाके मानवता की  मशाल लिए चलते चलो बढ़ते चलो ना सोचना कभी कौन क्या सोचता है खुद के बारे में खुद की राय बनाके वीर तुम चलते चलो धीर तुम बढ़ते चलो सोते जागते उठते बैठते खूब देखना सपने फिर भागना उन सपनों के पीछे सपना वही देखना जो मन को भाये।। तिरस्कार को ही हथियार बनाके खुद को प्रेरित करना वत्स सकारात्मकता को ही अपना नजरिया बनाके जीवन मे बढ़ते चलो चलते चलो व्यंग्य हो या उपहास उड़ाती बातें वीर तुम बढ़ते चलो धीर तुम चलते चलो।। मनोज प्रधान