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माँ और बेटों की स्थिति

 एक बेटा के मन रो आता अपनी माँ खातिर  गाँव का रहने वाला सब लेकिन नौकरी और काम  शहर में! लेकिन मां का मन पढ़े तकलीफ होत मां गाँव ही में रहना चाह रहीं है  उसका मन शहर के बंद जीवन में नहीं लग रहा  बोलती नहीं वो माँ किन्तु बेटा पढ़ पा रहा ये  कैसा विरोधाभास से भरा ये परिस्थिति है  गाँव मे ताला बंद लेकिन माँ का मन बेचैन  व्याकुल! व्याकुल तो बेटा भी है किन्तु शहर छोड़े तो कैसे  दूसरा बेटा भी अपनी जिंदगी की दौड़ में व्यस्त  एक ही स्थिति किन्तु माँ की ये व्याकुलता  गाँव की खातिर देख मन व्यथित है! माया मोह की ये दोहरी ज़ंजीर बड़ी अजीब है  गाँव मे बिताए हुए लम्हे माँ का मन कचोट रहा होगा ! शहर के चकाचौंध फिर भी माँ के मन वीरान है ! बाबुजी की एक बात बार बार याद आ रहीं है  जो अपने जीवन का ज्यादातर समय जहां व्यतित  करता है वही जगह उसको खिंचता है  वहीँ ज्यादा रिश्तों से जुडाव या जगह से  लगाव हो जाता है!! जीवन की ये विरोधाभास मन को व्याकुल किए  हुए है! क्या समाधान है नहीं पता!

मनुष्य जीवन

“How different branches of the same tree gradually grow into separate large trees of their own! Each develops its own way of eating, living, walking, rising, and resting. Sometimes, thinking deeply about it feels strange, yet this is the ultimate truth of life. The attachment to the original tree always remains, though perhaps it weakens slowly with the passage of age and time. What a marvelous creation human life is by the Creator! Every branch slowly builds its own world of relationships, and with time, its hold on the original tree becomes looser. O Lord, what a profound human life and divine illusion You have created!” — Manoj Kumar Pradhan एक ही पेड़ की के अलग अलग शाखाएँ कैसे अलग अलग बड़े पेड़ का रूप धारण कर लेता है!  अपना खाना पीना चलना उठना बैठना सब अपना अपना!  कभी कभी सोचनेे से अजीब सा लगता है किंतु यही सत्य है। मूल पेड़ से लगाव रहता है जो शायद उम्र की गणना अनुसार कमजोर पड़ जाता होगा!  क्या जीवन बनाया है बनाने वाले ने!प्रत्येक शाखा का अपना रिश्तों का संसार बनते जा...

सुनील सिंह और सुषमा सिंह

 बोकारो से मिनी ट्रक लेकर कोलकाता पहुंचा एक couple वो भी रात्री के दो  बजे। साल 2005 की बात रहीं होगी  हैलो प्रधान जी मैं सुनील सिंह रूबी पहुंच गया हूं  मित्रों मंजिल किधर है जहां मेरे लिए एक फ्लैट  Arrange किया गया है heritage की तरफ से  अच्छा सीधा आइए फिर बाएं फिर दाहिने  नहीं मिल रहा जी  अच्छा आता हूं रुकिए वहीँ  वो साल दूसरा था और ये साल दूसरा है  पता नहीं कितनी हँसी ठहाकों की महफिलें  En दोनों लोगों के साथ तब से लेकर आज तक रोते हुए को हँसा लेने की महारत हासिल सुनील जी का  क्या ही कहना।। कोई मसला या पेंच फंसने पर हैलो सुषमा जी ये इशू है क्या करना चाहिए  बारीक और परखी नजर वाली सुषमा जी का भी कोई ज़वाब नहीं  और उनके सोना का तो कुछ ना ही कहे तो अच्छा है  हैलो सोना आइए प्रधान जी आनेवाले है  बस और क्या मेरे आने से पहले ही सोना हाजिर  क्या बात है सोना भाई कैसे कर लेते है ये सब  इतना कह्ते ही  हँसने हँसाने वाली बातों की फूल झड़ी छोड़ देने वाले सुनील जी को कुछ ना बोलना ही अच्छा है  Ajij दोस्त...

श्रद्धांजलि

I bow my head in salute to him—..Words fall short to express the deep pain and sorrow I feel at the sudden and untimely demise of my elder brother Santosh Kumar Ray. The Heritage Group has lost a true frontline leader. He was bold yet balanced, aggressive yet disciplined—someone who always aimed to achieve goals while safeguarding the larger mission. Like a seasoned batsman, he knew when to strike big and when to protect his wicket, ensuring stability for the entire team. He was result-oriented, strategic, and exceptionally confident. Confidentiality and trust were among his greatest strengths.He used to say what his left hand doing is not known to even his right hand. He had solutions for every challenge and carried immense respect for the CEO Sir and the honourable members of KBT, earning equal respect in return.His rare ability to recognize people’s strengths and utilize them in the best possible way made him an extraordinary leader. Two years ago, when I was facing a tsunami of cha...

मैं और हम

 जन्म और बड़े हुए संयुक्त परिवार वाले व्यवस्था में  जहाँ मिलजुलकर या थोड़ा लड़ते झगड़ते हुए  प्रेम के साथ समय चला गया.... कब बड़े हो गए, कब धीरे धीरे अपना एक अलग  कुनबा तैयार होता गया.....हम से अलग एक मैं वाली बातें और उसका शिकंजा कसता गया....शायद स्वार्थ और छोटी सोच के दायरे में हम विभाजित होकर कई सारे मैं के रूप मे स्थापित हो गए..... सोच छोटी से और छोटी होती गयी.... अब मैं और मेरा परिवार करते-करते कहां से कहां आ गए हम.... पता नहीं.... पहले ज़रूरतें कम हुआ करती थी आज बहुत बड़ी बड़ी जरुरतों ने  आमदनी को बढ़ाने और उसमे ही मशगूल हो जाने का मानो बहाना दे दिया..... जिधर नजर जाता है यही व्यवस्था दिखता है.....छोटी छोटी बातों में हम का कचूमर निकल रहा नित्य प्रतिदिन....मैं मैं करता यह रिश्तों का दौर पता नहीं कहां रुकेगा या यही मनुष्य जीवन का नया अध्याय है पता नहीं..... किन्तु घुटन जैसा महसूस होता है इस भाग दौड़ की मैं वाली जिंदगी में!! किसने मुझे हम से मैं बना दिया या कैसे ये सब रचना रिश्तों की बनतीं गयी.....ना इसका उत्तर मेरे पास है ना समाधान शायद..... किन्तु बहुत असहा...

ज्योतिष और गुरुजी

 मैं कर्मा और केवल कर्मा में बिश्वास करनेवाला था और हूं भी! एक भगवान में आस्था रखनेवाला..किन्तु पूजा और दूसरे परम्पराओं में थोड़ा कम बिश्वास करनेवाला एक आम आदमी!! ये पांच नवंबर 2023 का दिन था जब मेरे जीवन में एक सुनामी की दस्तक हुई और मैंने अपना हीरा जैसा चौदह साल का बेटा Medica Mukundapur अस्पताल में इलाज के दौरान खो दिया!! 4th नवंबर 23 को गुड्डू पंडि जी ने बता दिया था मेरे बेटे के बारे मे कि उसका और आयु नहीं दिख रहा उसकी कुंडली में...केवल 10% संभावना है उसको बचाने का!! भविष्य बताने का ये गणना ठीक साल महीना समय और जन्म स्थान के आधार पर पंडि जी द्वारा किया गया था और सबसे महत्वपूर्ण बात ये सब बातें कोलकाता से दूर औरंगाबाद बिहार से पंडि जी बता रहे थे जब हमारे दोस्तों और परिचितों ने महामृत्युंजय जाप करने के लिए उनसे संपर्क किया जो हिन्दू धर्म में जीवन रक्षक मंत्र के रूप मे जाना जाता है!!किन्तु उन्होंने ऐसा करने से मना कर दिया क्योंकि यदि बीच में कुछ होने से दूसरे सदस्य के उप्पर आघात हो सकता है और शायद हमारे ग्रंथों में ये वर्णित है फलस्वरुप पंडि जी केवल पाठ करने को राजी हुए 5th नवंबर ...

आकाशवाणी ढकाइच की

  जीवन के रंग बेरंग वक्त से दो चार करता  आज जैसे ही बिस्तर पर लेटा हि था तभी  आकाशवाणी गाँव की आयी! हैलो मनोज दूसरी आवाज अपने गाँव की  क्या हुआ मेरे दोस्त जो इतनी हडबडी में  आकाशवाणी करने की जरूरत आन पडी!! बहुत चिंतित और दुखी हूं मेरे बंधु :गाँव बोला  शहर की बुराइयाँ अब गाँव और कस्बों को  निगल रहीं मानो खत्म करके ही दम लेगी! एक जमाना था लोग प्रेम और लगाव के साथ  दूसरों के दुख में शोक मनाते नजर आते थे  आज गाँव वाले भी शहर वालों की सारी  बुराईयों को आत्मसात करते दिख रहे... घर घर में ताला बंद कर लोग पलायन और शहर  कि दहलीज पर दस्तक दे रहे है.... स्वार्थ और रिश्तों की बेरुखी में लोग शहर को भी  पिछे छोड़ने को बेताब नजर आ रहे! भाई अपने ही भाई के साथ दुश्मन जैसा बरताव  पड़ोसी की मौत किन्तु जश्न मनाने की बेताबी  देख रोने को जी चाहता है मनोज!! पता नहीं नकारात्मक बदलावों का ये दौर  कहीं मेरे अस्तित्व को ही ना मिटा दे! यही सोच रोना आ रहा! शहर जैसा यहां भी सभी खेल मैदान खेतों  मे बदल दिए गए है! मोबाइल की बीमारी और रील की...