मैं और हम
जन्म और बड़े हुए संयुक्त परिवार वाले व्यवस्था में जहाँ मिलजुलकर या थोड़ा लड़ते झगड़ते हुए प्रेम के साथ समय चला गया.... कब बड़े हो गए, कब धीरे धीरे अपना एक अलग कुनबा तैयार होता गया.....हम से अलग एक मैं वाली बातें और उसका शिकंजा कसता गया....शायद स्वार्थ और छोटी सोच के दायरे में हम विभाजित होकर कई सारे मैं के रूप मे स्थापित हो गए..... सोच छोटी से और छोटी होती गयी.... अब मैं और मेरा परिवार करते-करते कहां से कहां आ गए हम.... पता नहीं.... पहले ज़रूरतें कम हुआ करती थी आज बहुत बड़ी बड़ी जरुरतों ने आमदनी को बढ़ाने और उसमे ही मशगूल हो जाने का मानो बहाना दे दिया..... जिधर नजर जाता है यही व्यवस्था दिखता है.....छोटी छोटी बातों में हम का कचूमर निकल रहा नित्य प्रतिदिन....मैं मैं करता यह रिश्तों का दौर पता नहीं कहां रुकेगा या यही मनुष्य जीवन का नया अध्याय है पता नहीं..... किन्तु घुटन जैसा महसूस होता है इस भाग दौड़ की मैं वाली जिंदगी में!! किसने मुझे हम से मैं बना दिया या कैसे ये सब रचना रिश्तों की बनतीं गयी.....ना इसका उत्तर मेरे पास है ना समाधान शायद..... किन्तु बहुत असहा...