लम्हे जीवन के।।
तेरी याद आ रही है याद आ रही है
वो कांच की गोलियां व गुल्ली डंडे
वो लुका छुपी वाले खेल व दोस्त
गांव की ऊबड़ खाबड़ गलियां
गन्ना गेंहू धान के वो हरे भरे खेत
मिशन स्कूल की वो यादें
कक्षा पांच छह सात के वो दोस्त
आती बहुत याद है उनकी
नही मिल पाए फिर कभी
वो विदाई गीत व आंसू के पल
रवि भूषण पांडेय या संतोष सिंह
या नीतीश जैसवाल या सुनील
वो प्रियंवदा या शालिनी चौबे
कुछेक के नाम भी नही रहे अब याद
कैसा ये जीवन है कितनी भागम भाग
आज कैसा सोशल मीडिया भी नही था तब।।
दोस्ती की परिभाषाएं भी थी अलग
आंखों को पढ़ने लेने की अजीब ललक
तब हुआ करती थी।।
वो चर्च के के भित्तर की प्रार्थना सभाएं
बागवानी की कक्षाएं व मलाई बर्फ खाते
वो पल.....
कौन कहाँ होगा कुछ नही पता।।
आंखों से आंखमिचौली करती तब
बिजली के बल्ब।।
साईकल चलाके ट्यूशन जाते वो पल
तिवारी जी के अंग्रेजी की कक्षाएं
वही खिरौली में कॉमर्स वाले क्लास।।
फिर बनारस की खट्टी मीठी यादें
जनार्दन सिंह के खोंचवाँ स्कूल की
वो बेहतरीन एक साल के लम्हे
कुछ दोस्तों की कहानियां आज भी
मन को कचोटती है बारम्बार।।
फिर भी भागमभाग का जीवन
बदस्तूर जारी है रुकने का कोई नाम नही।
बार बार मन पूछता क्या है मंजिल
कब रुकेगी ये भागमभाग।।
कब छू पाऊंगा उन दोस्तों को
क्या कभी मिलना भी होगा उन पलों में।।
माया मोह का ये जीवन की निरंतरता
अजीब लीला ही इसकी।।
रात हो जाने से व अकेले में होने से
याद आते है वो पल।।
फिर वो फिलिस्तीनी दोस्त जो
मिला बनारस में का क्या कहना
अब नही रहा इस दुनिया मे।।
अपने रास्ते अपने जीवन की डोर
वो पल अब कभी नही आ पाएंगे
तेरी याद आ रही है।।
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