मनुष्य जीवन
जीवन तो जन्म मृत्यु का एक खेला भी है ये माया-मोह जलन दुश्मनी फिर क्यूँ जब एक दिन मरना ही है कुछ ना साथ जाएगा यहाँ से फिर बड़ी सोच और त्याग क्यूँ नहीं इंसानी रिश्ते त्याग और समर्पण से लगाव और बातचीत से होते मजबूत है! मेरा बेटा मेरी बेटी मेरी बीबी बस यही रह गया है परिवार की परिभाषा आज चाह के भी संयुक्त परिवार की अवधारणा जिवित होते हुए नहीं दिखती आजकल सभी अपनी अपनी लीला में व्यस्त भागते हुए जरुरतों को पूरा करते करते कब बुढ़ापे की दहलीज को छुने लगते खुद भी आभास ना हो पाता! हम सभी कम या ज्यादा स्वार्थ की लीला से ग्रसित इक्षा या अनिच्छा से बंधे हुए आज!! ये याद दिलाने का समय है खुद को ये सही जीवन नहीं है ..... स्वार्थ की कर्म लीला से उठकर त्याग और लगाव का भी समय है.... कितना और क्या किया कुछ अपने बाकी रिश्तों खातिर!! हँस के बात करना और कुछ पल बांटना भी रिश्ता होत है!! खुद को खुद का आईना ही सही जानकारी देत है कौन है हम क्या कर रहे और मंजिल क्या है!!!