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Showing posts from July, 2023

गाँव का फोन

 कल जैसे ही सोया होगा अचानक फोन बजा  कान के पास फोन रखते ही आवाज जानी पहचानी  सी लगी और कोई नहीं ये मेरा बचपन वाले गाँव का ! दूसरी ओर गाँव बड़े ही भावुक अंदाज में बोला  हैलो मनोज दूसरी आवाज मेरे ढकाईच गाँव की.... उन्नीस सौ इक्यानबे से तुम बाहर हो भाई... बहुत हो गया अब लौट आओ अपने गाँव... बचपन की उन यादों जैसा सजाओं मेरे को  वीरान होता जा रहा हूं  नित्य प्रतिदिन  कुछ हरा भरा जो बचा था वो भी बड़े सड़क  बनाने के लिए काट डाला.... बहुत देर हो जाए उसके पहले अच्छे लोगों को  बुला लो गाँव!! आज गाँव को उनकी जरूरत आन पड़ी है  तीस बत्तीस साल हो गया गाँव छोड़े  अब लौट जाओ मेरे यार... पेड़ पौधे बड़े बगीचों से मेरे को फिर से  सजा दो ताकि ज्यादा लोगों को याद दिला  पाऊँ उनका बचपन!! मैं बोला गाँव को- बड़ा मुश्किल है शहर को छोड़ना मेरे भाई  इतना आसान नहीं जितना दिखता है  माना मेरा मन हमेशा अपने गाँव में बसा सा रहता है  फिर भी मुश्किल है शहर को छोड़ना  इतने दिनों में यहां भी बहुत सारे रिश्ते नाते  माया मोह की मकड़ जाल...

हमारा बचपन और गाँव

 कच्ची सडकों की याद बहुत है आती  वही किनारे बगीचा में मिट्टी के घरोंदे  उन घरौंदों में आम जामुन रखनेवाले क्षण वो पल कुछ और ये पल कुछ और  आम और जामुन बीनते वो पल ! महुआ बीनने के पल भी याद आये  बारिश में भीगते आम जामुन चुनने का  तब का अंदाज कुछ और था ! आज सोचता हूं लगता ऐसा मानो  जोकर सिनेमा की ही अलग कहानी हो  सच में जीवन बचपन जवानी और बुढ़ापा की कहानी ही तो है... किन्तु बचपन जैसा कोई नहीं !! ओला पाती का पेड़ पेड़ वाला खेल भी  गुल्ली डण्डा और गोली का खेल अब कहाँ  कित कित कर्ता हुआ भी एक था खेल  कुछ खेलवा का नाम भी भुला गया सा हूँ  इस शहर की भागमभाग जिंदगी में!! गन्ना तोड़ना और लगातार चूसने के पल  गरमागरम गुड़ भी खाने का भी नसीब हुआ तब .. आज का मेरा गाँव भी बदल गया जैसा मैं  हाई वे सड़क बिना बगीचा वाला मेरा गाँव  जब जाता हूँ गाँव खुद से पूछता हूँ!! मेरा तो मेरे बचपन वाला गाँव ही मेरी  यादों मे बसा हुआ दिखता है..... जहाँ हेअर नाम के पौधे से भी गुलि डण्डा  सेमर का  भूत की याद दिलाता वो पेड़ .. नंगे पाँ...

City Village and Life

I slept after dine one night Soon after i start dreaming  Where village and city started  A conversational fight  Why not easing the burden of my people  Why not releasing them to come to my lap  O polluted city you tied my people in fetters  Many willing to come to me But helpless to do so ! Appealing crowded city to permit my members to join me Were more happy more relax here more comfort under trees under bigger gardens Than cars or acs in bigger buildings ..Village to City     In large numbers my members departing towards you  Now you r starting eating my space  By entering and converting villages into cities ... Be fearful of God ! Dont do injustice to me  Change is the nature of universe Again my time my term wil come  naughty city ! Remember the days of Corona  How i supplied everything to you ! How you cried that time  How you were being locked closed by an unknown virus corona  Milk vegetables to al...

इंसान हूँ

  ऐ धरती पे नफरत के सौदागरों जल्लादो छोड़ दो हमें अपने हाल पे! हम इंसान थे इंसान ही रहने दो  दो हाथ दो पैर दो आंखें क्या काफी नहीं  पहचान लेने को की हम इंसान है! हम काले है गोरे है छोटे है बड़े है किन्तु हम इंसान है  हम ब्राह्मण है या क्षत्रिय या पिछड़ी जाति का  या यूक्रेन वाले या रूस वाले या अमेरिका वाले  इंसान ही हमारी नस्ल है हैवानों!! नहीं पता ये कुकी कौन या ये meity कौन  इंसानों को इंसान ही बने रहने दो ऐ धरती के जल्लादो  सत्ता की चाह में अंधे व लालची तानाशाहों  इसी मिट्टी में मिल जाओगे तुम भी एक दिन  क्यूँ इंसान को इंसानों से हो मरने मारने को  उतावले बनाने की चाह में अंधे हुए जा रहे हो  अरे हम इंसान ही थे इंसान ही रहने दो दो कौड़ी  के नफरत से भरे हुए मानवता के दुश्मनों!!! कोई धर्म के नाम पे कोई जाती के नाम पे  कोई भाषा के नाम पे कोई क्षेत्र के नाम पे  नफरत की असीमित युद्ध में धकेलने को बेताब  कुछ तो शर्म कर लो नफरत के सौदागरों! हम इंसान ही है इंसान ही रहने दो!! माना तुम प्रेम का प भी नहीं जानते किन्तु...

शर्मिंदा हूं

 आँखों में आँसू लिए बैठे सोच रहा हूँ  दर्द की असीमित पीड़ा झेल रहा हूँ  वैसे चारो ओर हिंसा का नंगा नाच  कोई नयी बात नहीं!! किन्तु मणिपुर की आज की तस्वीर देख  केवल सोच रहा हूँ दर्द झेल रहा हूँ  किसी के घर की बिटिया होगी किसी की बहना होगी!! अरे हैवानों किसी की लाडली होगी  ये नग्नता मानवता को शर्मसार करनेवाली  आज शर्मिंदा हूँ कि मैं भी एक कतरा हूँ  इसी समाज का!! एक दूजे के खून के प्यासे कैसे है ये  कैसे आज के नंगे हमारे ये हुक्मरान है अरे नफरत बांटते हुक्मरानों क्या हिसाब दोगे  उप्पर वाला जरूर देख रहा होगा.... भगवान राम का नाम और रामराज्य कहते नहीं थकते हो  किन्तु ऐसी भयानक मानवता को शर्मसार करती तस्वीरे  शर्मिंदा हूं मैं किंतु!! निर्लज्ज हो चुके हमारे हुक्मरान  सत्ता की चाह में अंधे और हिंसक मनोवृत्ति वाले  हमारे आज के सच मे अनपढ़ राजाओं की जमात!