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माँ और बेटों की स्थिति

 एक बेटा के मन रो आता अपनी माँ खातिर  गाँव का रहने वाला सब लेकिन नौकरी और काम  शहर में! लेकिन मां का मन पढ़े तकलीफ होत मां गाँव ही में रहना चाह रहीं है  उसका मन शहर के बंद जीवन में नहीं लग रहा  बोलती नहीं वो माँ किन्तु बेटा पढ़ पा रहा ये  कैसा विरोधाभास से भरा ये परिस्थिति है  गाँव मे ताला बंद लेकिन माँ का मन बेचैन  व्याकुल! व्याकुल तो बेटा भी है किन्तु शहर छोड़े तो कैसे  दूसरा बेटा भी अपनी जिंदगी की दौड़ में व्यस्त  एक ही स्थिति किन्तु माँ की ये व्याकुलता  गाँव की खातिर देख मन व्यथित है! माया मोह की ये दोहरी ज़ंजीर बड़ी अजीब है  गाँव मे बिताए हुए लम्हे माँ का मन कचोट रहा होगा ! शहर के चकाचौंध फिर भी माँ के मन वीरान है ! बाबुजी की एक बात बार बार याद आ रहीं है  जो अपने जीवन का ज्यादातर समय जहां व्यतित  करता है वही जगह उसको खिंचता है  वहीँ ज्यादा रिश्तों से जुडाव या जगह से  लगाव हो जाता है!! जीवन की ये विरोधाभास मन को व्याकुल किए  हुए है! क्या समाधान है नहीं पता!