अभिलाषा मन की
उड़ान की चाह लिए नित्य प्रतिदिन आता हूं जाता हूँ सोचता हूं!! एक ऊर्जा भरने की कोशिश करते-करते कभी छुप छुप रोता हूं बिलखता हूं! समय की मार से भला कौन बच पाया है मार झेलते भी हँसते मुस्कराने की चाह नयी ऊर्जा भर एक बार और उड़ने की चाह मुस्कुराना भी रोना भी होगा इस जीवन में जितना कोशिश समझने की इस जीवन को उतना ही उलझते जाओगे!! जीवन का दर्द सिर्फ अकेले ही झेलना है कोई रिश्ता नहीं बांट पाएगा समय की मार को किन्तु यदि जीना हो फिर से नयी ऊर्जा वही नया जुनून भरना होगा उड़ने खातिर खुद की खातिर खुद से लड़ना होगा यदि जीवन जीना हो !! पीड़ा या दुख ना बाँटो कभी किसी से हँसी खुशी खूब बांट कर जी लो ! जीवन की धार ही बदल गयी सी लगती है समय की मार के आगे बेबस सा कभी पाता हूं एक ऊर्जा भर जीने की आश अभी जिंदा है... सिसकियाँ लेते लेते अश्रु शुष्क हो गए से मन अनगिनत ख्यालों में डूबा सा खुद को कोसना एक आदत सी मानो जीवन पतझड़ सा विरान हुआ लगता है फिर भी उड़ान की चाह ऊर्जा भर लेने को ...