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Showing posts from October, 2021

जीवन रस

 सात नवंबर जन्मदिन वाले  फ्लैट में यादों व लम्हो को सहेज रहा हूँ।। चारों ओर शोरगुल भागमभाग में भी एक पल अपना खोज रहा हूँ।। कौन कहाँ आता बैठता था उन पलों को कैसे मिलना जुलना हंसी ठिठोली हुआ  करता था तब उसको सहेज रहा हूँ।। कौन कौन से वो पल थे जो देते गए शुकुन  दिलोदिमाग को उनको समेट रहा हूं।। कालितला के इस मुहल्ला की भाग दौड़ में भी कुछ अपना खोज रहा हूँ।। अच्छे पल व यादें ही जीवन रस देती है। बुरे पल तो सपने जैसे भुला दिया करता हूँ।। अच्छे बुरे उन लम्हो में भी कुछ पल  अपना खोज रहा हूँ।। अरे दोस्तों क्यों सोचते हो नकारात्मक  सकारात्मक रूप से कुछ जीवन रस ले लो।। कही और ना सही घर मे ही देख लो जीवन साथी की आंखों को ही निहार लो। हो सके तो कुछ पल खो जाना उन नयनों में।।।क्या अच्छा क्या बुरा भूल जाओ थोड़े पल खातिर।।। इश्क़ हो या मोह्हबत की उन यादों को ही तरोताजा कर लो दोस्तों।। कभी डूबके देख लो उन मीठी मुस्कानों को उन प्यारी आंखों को उन अदाओं को।। जिसपे कभी तुम लट्टू हुआ करता था।। समय के साथ जरूर बदल लेना खुद को नही तो समय ही बदल देगा हमसबको ।। घर के बाहर भी यदि कोई नयन ...

मीठी मुस्कान

 मीठी मुस्कान क्या है ये स्वच्छंद मुस्कान जीवन की सबसे बड़ी अनमोल धरोहर है  जीवन को गतिमान बनाने का हीरा है ये गया था एक बगीचा में घूमने किसी मकसद से... दो सुंदर सुशील तितलियों की मुस्कान  अजीब मंत्रमुग्ध आनदविभोर वाली  थी वो मुस्कान दोनों तितलियों की मैं खड़ा अवाक देखता रहा निहारता रहा पल भर लगा जैसे किसी स्वर्ग रूपी दूसरी दुनिया का दर्शन कर रहा जैसे रंग बिरंगे पंख चार चांद लगा रहे जैसे नयनों की चमक क्या खूब नशीली  सोचता रहा पल भर को मगन होके होते दर्शन बहुत विरले ही ऐसी मीठी मुस्कानों के.... नही पता क्यों लोग करते है नशा सेवन ये मीठी मुस्कान का आनंद विभोर दृश्य जैसे किसी और दुनिया का हो जैसे इतनी स्वछंद उन्मुक्त मुस्कुराहट इनकी इतनी भोली व चमकती आंखें  ये सपना था या हक़ीक़त सोचता हुआ  तब तक किसी ने आवाज़ लगाया जैसे फिर मैं चलता रहा सोचता रहा स्वार्थी मुस्कान हु देखा व्यंग्य वाला भी लाइन मारनेवाला मुस्कान भी हु देखा ये मीठी मुस्कान स्वच्छंद व उन्मुक्त  नही हो रहा था विश्वास निज को।। जो भी हो मन आनंदविभोर हो गया इतना ताकतवर ये मीठी मुस्कान ना था कोई अह...

यादें

 हम तो यही है आपके आसपास गए ही कब थे जो आने का सवाल हो सोलह सालो की ये यात्रा यही तो थी अभी भी वही है मन के आईने में ।। वो वक़्त दूसरा था दोहज़ार पांच वाला ये वक़्क़ दूसरा है इकीस वाला  किंतु हम तो यही थे कल भी आज भी वही है।।। हंस के मन को मना लेते है।। कंक्रीट के जंगल मे ठंढक खोजता  ये राही यही तो है आपके आसपास कभी यादों के झरोखों में भी खो जाना बीते हुए अच्छे पलों को याद कर लेना चोट से मिले सिख को भी जरूर याद करना।।। सिख भी इसी जीवन का अंग है कब बदमाशि किये कब शैतानी रखते है मायने ये भी।। बचपन जवानी व दस्तक देता बुढ़ापा।। ढेर सारी अछि यादें है मनोमस्तिक में कट जाएगा मन आनंद में ।। कर्तव्य जिमेदारी से थोड़ी फुर्सत हो तब जरूर यादों के झरोखों से देख लेना उन भूले बिसरे पलों को।। कभी पौधों संग ठंढक पाता तो कभी  छत पे बैठा अंधेरे को निहारता ।। किंतु हु आसपास ही।। मन से ही आने जाने मिलने मिलाने  वाला यही हु बस मन को पूछना है।। सिसक सिसक कर जीना भी क्या जीना खुलके मन से जी लेना जीवन को मिला है ये बेशकीमती जीवन इंसान का ना कोई गांठ रखना ना कोई नफरत प्यार बिन सुना है ये जीवन ...