फुर्सत के पल
ना जाने कहाँ गए वो फुर्सत के पल बेकार की बातों में कैसे समय बीता लिया करते थे तब के दिनों आम और जामुन के बगीचों में रिश्तों संग घंटों बिताए पल किन्तु आज वो फुर्सत के पल कहीं खो गए लगते है अपनों के आने से भी समय की भारी किल्लत काम में व्यस्तता इस कदर हावी मानो जैसे ये कोई और काल हो शाम को घर आते ही उन पलों से तुलना अनायास ही मन भारी और दुखी जैसा दिखता है खोजता है उन फुर्सत के पलों को जो कभी हुआ करते थे ईन रिश्तों संग... ऐसा मानो जैसे हम मशीन हो गए हों आज के दिन शायद यही हकीकत सी लगती है....