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Showing posts from December, 2023

कहाँ गया मेरा बाबु

 निस्सहाय और नम आँखों से खोज रहा  मैं अपने भोले भाले बाबु को ! कभी जहाँ पढ़ने जाता था वहां खोज रहा  तो कभी मोहल्ले की सड़को पर! अस्पताल का वो दृश्य आँखों में बस गया लगता है ! एक कमजोर व लाचार पिता आंखें नम किए  इधर उधर खोज रहा अपने बाबु को! खूब रोने का भी मन कर रहा किन्तु नहीं कर पा रहा  कैसी ये मजबूरियां है एक पिता की! कितना लाचार और कमजोर  हूं मैं! घर पहुंचने से उसके बेड को निहारती ये आंखें  उसकी साइकिल उसके खिलौने सब नजर आते  किन्तु मेरा बाबु नजर नहीं आ रहा ! कर्मा ही भगवान है में बिश्वास करनेवाला  अपने कर्मों को खंगाल रहा किन्तु कुछ भी  नज़र नहीं आ रहा!! ये कैसी है मजबूरियां एक पिता की.... जन्म और मृत्यु पर कैसे निस्सहाय और मजबूर  अवस्था में खड़ा खुद को पा रहा हूं! बेटी और पत्नि कमजोर ना हो जाए ये सोच  रोना भी नहीं आता!! छुप छुप के रो लिया कर्ता हूं!! कैसी कैसी मजबूरियां और लाचारी है एक पिता की!! कौन कमबख्त बोलता है पिता नहीं रोता  रोता हमेशा है किन्तु छुप छुप के...

माया मोह और जीवन

 बहुत सारे रंग है इस मानव जीवन के  बचपन की अठखेलियाँ और अल्हड़पन  लड़ते झगड़ते फिर प्रेम वाले पल!! आँखों में सपने पाले बड़े होते हम मानव  कभी ठोकर तो कभी सफ़लता की सीढ़ियां  ना जाने कितने रंगो को देखते होते रूबरू  फिर जवानी के खूबसूरत पलों से.... कितने सपने आते पूरे होते या टूट जाते  शायद यही माया मोह का ये मनुष्य जीवन  फिर गृहस्थ जीवन जिसमें होता फिर एक  नया परिवार और नयी माया-मोह की बेड़ियाँ  पहले के माया-मोह कम होते फिर नया माया-मोह  अपने आगोश में कब ले लेता पता ही नहीं! नयी ऊर्जा नयी प्रेरणा तो कभी ठोकर मिलती  बहुत मुश्किल है समझना इस मनुष्य जीवन को! तो कभी आपका प्राण ही प्रभु ले लिया करते है  जिसमें अपना प्राण बसाया यदि वही प्रभु ले ले  तब क्या होत इस मनुष्य जीवन का.... फिर भी जीना है चलना है इस जीवन में!!!