कहाँ गया मेरा बाबु
निस्सहाय और नम आँखों से खोज रहा मैं अपने भोले भाले बाबु को ! कभी जहाँ पढ़ने जाता था वहां खोज रहा तो कभी मोहल्ले की सड़को पर! अस्पताल का वो दृश्य आँखों में बस गया लगता है ! एक कमजोर व लाचार पिता आंखें नम किए इधर उधर खोज रहा अपने बाबु को! खूब रोने का भी मन कर रहा किन्तु नहीं कर पा रहा कैसी ये मजबूरियां है एक पिता की! कितना लाचार और कमजोर हूं मैं! घर पहुंचने से उसके बेड को निहारती ये आंखें उसकी साइकिल उसके खिलौने सब नजर आते किन्तु मेरा बाबु नजर नहीं आ रहा ! कर्मा ही भगवान है में बिश्वास करनेवाला अपने कर्मों को खंगाल रहा किन्तु कुछ भी नज़र नहीं आ रहा!! ये कैसी है मजबूरियां एक पिता की.... जन्म और मृत्यु पर कैसे निस्सहाय और मजबूर अवस्था में खड़ा खुद को पा रहा हूं! बेटी और पत्नि कमजोर ना हो जाए ये सोच रोना भी नहीं आता!! छुप छुप के रो लिया कर्ता हूं!! कैसी कैसी मजबूरियां और लाचारी है एक पिता की!! कौन कमबख्त बोलता है पिता नहीं रोता रोता हमेशा है किन्तु छुप छुप के...