नफरत।।
हे मानव दो हाथ पैरों वाला
दो छोटी छोटी आंखों व कानो वाला
एक मस्तिष्क वाला मानव
क्यों इतना इतराते हो
नफरत व अहंकार का गोला
मन मे लिए घूमते हो।।
बहुत तुक्ष है अस्तित्व तुम्हारा
इस विशालकाय व अनंत ब्रम्हांड में
कभी गिनती करके ही देख लो
सूरज व इतने ग्रहों का आकार
रोक दिया एक अदृश्य वायरस ने
गतिमान तुम्हारे जीवन को।।
फिर भी घमण्ड व इतनी नफरत
लिए मन मे घूमते हो।।
जीते हो जीवन केवल अपने लिए
अपने बच्चे अपनी बीबी
साथ मे खेलनेवाले भाई को भी
पराया जैसा व्यवहार हो करते
मां बाबूजी ने पाल पोष के किया
बड़ा व लायक या नालायक बनाया
उनको भी केवल अपने स्वार्थ की खातिर इस्तेमाल हो करते।।
फिर भी घमण्ड का गोला क्यों मन मे
लिए हो घूमते।।
देखो इस अनंत व विशालकाय अंतरिक्ष को ।।
कर लेना तुलना उसके सामने
खुद से कभी भी जब समय मिले
जवाब तुम्हे खुद को खुद से ही मिल जाएगा।।
ओ नासमझ मानव इस धरती को ही
कभी लेना देख ध्यान से।।
वो भयानक गर्जना करता हुआ समुद्र
ना बिश्वास हो देन कोई बड़ा पहाड़ ही
लेना देख अपनी छोटी छोटी आंखों से
पूछ लेना वहीं अपने आप से
मन मे उठते नफरत व घमण्ड को
पूछ लेना क्यों है ये मन मे आया
किस बात का ये अहंकार हे तुक्ष मानव।।
एक बार बीमार पड़ने से ही दिन में भी दिखते तारे फिर भी ये अहंकार क्यो।
बड़े प्यार से भेजा होगा बनानेवाले ने तुमको इस सुंदर धरती पे ।।
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