गाँव का फोन

 कल जैसे ही सोया होगा अचानक फोन बजा 

कान के पास फोन रखते ही आवाज जानी पहचानी 

सी लगी और कोई नहीं ये मेरा बचपन वाले गाँव का !

दूसरी ओर गाँव बड़े ही भावुक अंदाज में बोला 

हैलो मनोज दूसरी आवाज मेरे ढकाईच गाँव की....

उन्नीस सौ इक्यानबे से तुम बाहर हो भाई...

बहुत हो गया अब लौट आओ अपने गाँव...

बचपन की उन यादों जैसा सजाओं मेरे को 

वीरान होता जा रहा हूं  नित्य प्रतिदिन 

कुछ हरा भरा जो बचा था वो भी बड़े सड़क 

बनाने के लिए काट डाला....

बहुत देर हो जाए उसके पहले अच्छे लोगों को 

बुला लो गाँव!!

आज गाँव को उनकी जरूरत आन पड़ी है 

तीस बत्तीस साल हो गया गाँव छोड़े 

अब लौट जाओ मेरे यार...

पेड़ पौधे बड़े बगीचों से मेरे को फिर से 

सजा दो ताकि ज्यादा लोगों को याद दिला 

पाऊँ उनका बचपन!!

मैं बोला गाँव को-

बड़ा मुश्किल है शहर को छोड़ना मेरे भाई 

इतना आसान नहीं जितना दिखता है 

माना मेरा मन हमेशा अपने गाँव में बसा सा रहता है 

फिर भी मुश्किल है शहर को छोड़ना 

इतने दिनों में यहां भी बहुत सारे रिश्ते नाते 

माया मोह की मकड़ जाल मजबूत करती 

यहां के घर गाड़ियां और ये बच्चे!!

अजीब सी धर्म संकट का ये काल है मेरे खातिर 

कभी गाँव की तरफ तो कभी शहर ओर!!

मन मानो अभी उड़ जाने को बेताब तभी 

आकाशवाणी शहर की आयी...

ना ऐसा ना करना मनोज!

अभी बच्चे छोटे छोटे फिर ये विरासत कौन देखेगा 

बीबी और बच्चों को कौन देखेगा 

एक पल के लिए मानो एक ज़ंजीर से बँधा हुआ 

खुद को महसूस कर रहा था मैं....

तभी आंखें खुल गयी और सपना आधा ही रह गया...




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