हमारा बचपन और गाँव
कच्ची सडकों की याद बहुत है आती
वही किनारे बगीचा में मिट्टी के घरोंदे
उन घरौंदों में आम जामुन रखनेवाले क्षण
वो पल कुछ और ये पल कुछ और
आम और जामुन बीनते वो पल !
महुआ बीनने के पल भी याद आये
बारिश में भीगते आम जामुन चुनने का
तब का अंदाज कुछ और था !
आज सोचता हूं लगता ऐसा मानो
जोकर सिनेमा की ही अलग कहानी हो
सच में जीवन बचपन जवानी और बुढ़ापा की कहानी ही तो है...
किन्तु बचपन जैसा कोई नहीं !!
ओला पाती का पेड़ पेड़ वाला खेल भी
गुल्ली डण्डा और गोली का खेल अब कहाँ
कित कित कर्ता हुआ भी एक था खेल
कुछ खेलवा का नाम भी भुला गया सा हूँ
इस शहर की भागमभाग जिंदगी में!!
गन्ना तोड़ना और लगातार चूसने के पल
गरमागरम गुड़ भी खाने का भी नसीब हुआ तब ..
आज का मेरा गाँव भी बदल गया जैसा मैं
हाई वे सड़क बिना बगीचा वाला मेरा गाँव
जब जाता हूँ गाँव खुद से पूछता हूँ!!
मेरा तो मेरे बचपन वाला गाँव ही मेरी
यादों मे बसा हुआ दिखता है.....
जहाँ हेअर नाम के पौधे से भी गुलि डण्डा
सेमर का भूत की याद दिलाता वो पेड़ ..
नंगे पाँव दौड़ते तेज धूप या बारिश की कीचड़
वो पल बस यादों का हिस्सा हो रह गया!!
काश समय का पक्षी होता उड़ छु लेता उन पलों को
ढकाइच से दिया गाँव की वो कच्ची सड़क
पैदल आते जाते लोगों की तसवीरें
और आज की चमचमाती सड़क और लोग
गाड़ी और दुपहिया से भागते लोग....
कितना बदल गया मेरा गाँव तू.....
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