यादें

 हम तो यही है आपके आसपास

गए ही कब थे जो आने का सवाल हो

सोलह सालो की ये यात्रा यही तो थी

अभी भी वही है मन के आईने में ।।

वो वक़्त दूसरा था दोहज़ार पांच वाला

ये वक़्क़ दूसरा है इकीस वाला 

किंतु हम तो यही थे कल भी

आज भी वही है।।।

हंस के मन को मना लेते है।।

कंक्रीट के जंगल मे ठंढक खोजता 

ये राही यही तो है आपके आसपास

कभी यादों के झरोखों में भी खो जाना

बीते हुए अच्छे पलों को याद कर लेना

चोट से मिले सिख को भी जरूर याद करना।।।

सिख भी इसी जीवन का अंग है

कब बदमाशि किये कब शैतानी

रखते है मायने ये भी।।

बचपन जवानी व दस्तक देता बुढ़ापा।।

ढेर सारी अछि यादें है मनोमस्तिक में

कट जाएगा मन आनंद में ।।

कर्तव्य जिमेदारी से थोड़ी फुर्सत हो तब

जरूर यादों के झरोखों से देख लेना

उन भूले बिसरे पलों को।।


कभी पौधों संग ठंढक पाता तो कभी 

छत पे बैठा अंधेरे को निहारता ।।

किंतु हु आसपास ही।।


मन से ही आने जाने मिलने मिलाने 

वाला यही हु बस मन को पूछना है।।

सिसक सिसक कर जीना भी क्या जीना

खुलके मन से जी लेना जीवन को

मिला है ये बेशकीमती जीवन इंसान का

ना कोई गांठ रखना ना कोई नफरत

प्यार बिन सुना है ये जीवन हमारा ।।

हो सके जितना संभव गले लगाके 

जी लेना रिश्तों को ।।

भागमभाग का ये सफर यू ही बदस्तूर जारी रहेगा कंक्रीट वाले जंगल मे।।

फिर भी थोड़े पल फुर्सत के निकाल ही लेना।।

बहुत जरूरी है मन को आनदविभोर करना।।


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