आकाशवाणी ढकाइच की

  जीवन के रंग बेरंग वक्त से दो चार करता 

आज जैसे ही बिस्तर पर लेटा हि था तभी 

आकाशवाणी गाँव की आयी!

हैलो मनोज दूसरी आवाज अपने गाँव की 

क्या हुआ मेरे दोस्त जो इतनी हडबडी में 

आकाशवाणी करने की जरूरत आन पडी!!

बहुत चिंतित और दुखी हूं मेरे बंधु :गाँव बोला 

शहर की बुराइयाँ अब गाँव और कस्बों को 

निगल रहीं मानो खत्म करके ही दम लेगी!

एक जमाना था लोग प्रेम और लगाव के साथ 

दूसरों के दुख में शोक मनाते नजर आते थे 

आज गाँव वाले भी शहर वालों की सारी 

बुराईयों को आत्मसात करते दिख रहे...

घर घर में ताला बंद कर लोग पलायन और शहर 

कि दहलीज पर दस्तक दे रहे है....

स्वार्थ और रिश्तों की बेरुखी में लोग शहर को भी 

पिछे छोड़ने को बेताब नजर आ रहे!

भाई अपने ही भाई के साथ दुश्मन जैसा बरताव 

पड़ोसी की मौत किन्तु जश्न मनाने की बेताबी 

देख रोने को जी चाहता है मनोज!!

पता नहीं नकारात्मक बदलावों का ये दौर 

कहीं मेरे अस्तित्व को ही ना मिटा दे!

यही सोच रोना आ रहा!

शहर जैसा यहां भी सभी खेल मैदान खेतों 

मे बदल दिए गए है!

मोबाइल की बीमारी और रील की आदत यहां भी 

पेड़ों को काटने का सिलसिला भी यूँ ही जारी 

पुरानी यादों को सहेजते पुराने बगीचा भी ना रहा 

नया बड़ा सा राष्ट्रीय राजमार्ग और बढ़ती दुर्घटनाएं 

ये सभी कभी केवल शहरो की बीमारियाँ हुआ 

करती थी किन्तु आज गाँव भी इनकी चपेट में!!

अपने गाँव की बातें सुनकर एकदम अनुत्तरित 

लाचार सा केवल देख और सुन रहा था ये बेहाली 

वो भी गाँव के मुख से!!

क्या सही में गाँवों का भोला भाला वाला अस्तित्व 

रहेगा आनेवाले दिनों में या शहर की सारी बुराईयां 

गाँवों के अस्तित्व को खत्म ही कर डालेगी!!!

मैं:शहर में बहुत सारी अच्छाई भी है बंधु 

केवल बुराईयां ही नहीं है शहर में!!

अच्छे अस्पताल अच्छी शिक्षा व्यवस्था है 

आधुनिक तकनीक पहले शहरों में ही 

अच्छे और पढ़े लिखो की संख्या ज्यादा है 

किन्तु गाँव का भोला भाला शांत परिवेश 

यदि गायब हो रहा तब ये चिंतनीय है!!

लोगों के बीच लगाव कम हो रहा तब संकट 

ज्यादा ना सोचो मेरे यार !

समय को देखो सब ठीक कर लेगा.....

तभी अचानक आंखें खुल गयी 

और ये वार्तालाप का सपना अधूरा ही रह गया!!!




Comments

Popular posts from this blog

श्रद्धांजलि

मनुष्य जीवन

Me and Guddu pundit