जातीय विद्वेष और ढकाइच


कई जाति के लोग मिलजुल कर आजतक रहते आए है इस गाँव में...

हालांकि छुटपुट घटनाये जरूर हुआ करती थी पहले भी मारपीट की...

अब समय बदल गया है आधुनिक जमाना यानी इक्कीसवीं सदि में हमलोग आ गए है....चांद और मंगल ग्रह पर जानी की तैयारी में है....

शिक्षा और तकनीकी विकास ने लोगों को भी बहुत बदल दिया है.....

अब इस तरह के दौर मे जातीय विद्वेष या मारपीट या हिंसा के लिए कोई जगह नहीं होना चाहिए..

किसी को अपने को श्रेष्ठ और निम्न जातीय आधार पर सोचने या समझने का कोई अधिकार नहीं होना चाहिए!!

यदि कोई मारपीट की घटना हुई हो तब समझदार लोगों को आगे आकर चीजों को सम्भालने की जरुरत है.....

देश और अपने गाँव को यदि प्रतियोगिता करनी हो तो वो है शिक्षा जहां एक होड़ होनी चाहिए.....विद्वेष के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए.....

पूर्व मानसिकता से उबरने और चीजों को नए सिरे से देखने की जरूरत है....

दो लोगों या कुछ लोगों के बीच मारपीट या झगड़ा को जातीय चश्मा से देखना कितना सही है ये सोचने की जरूरत है!!

प्रबुद्ध और समझदार लोग को दोनों पक्षों से आगे आना चाहिए और आपसी सौहार्द को बनाते हुए गाँव को आगे बढ़ने का रास्ता प्रशस्त करना चाहिए....

नफरत और भागमभाग के इस दौर में कोई प्रेम वाला शख्स चाहिए अपने गाँव में जो नए चश्मे से चीजों को देख पाए.....

हमारा संविधान कर्तव्य और अधिकार दोनों देता है एक नागरिक के तौर पर!!


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