अभिलाषा

चाह एक अच्छा इंसान बनूँ और बने रहूं 

बच्चों को भी बाबुजी की कुछ बातें ज्ञान की देता जाऊँ !

ना जातीय घृणा मन को छुए ना 

राक्षसी रूप अधर्म वाला आए !

प्यार मोहब्बत का पैगाम ताउम्र 

चाह बस आसपास अच्छे लोगों को 

अच्छे समाज को देखता रहूं!

चाह तो केवल चाह यथार्थ नहीं 

कितनी पूरी होगी चाह नहीं मालूम 

किन्तु चाह तो है इस जीवन की....

चाह नहीं किसी के सामने झुकने की 

नौबत भी आए !

स्वाभिमान और प्यार का मिश्रण वाला 

स्वभाव मरते दम तक चलता चले !

बस यही चाह है एक आम आदमी की 

चाह बस अपने मन को पढ़ता रहूं 

अपने मन को अपना सुनार समझता 

रहूं और मेरा मन मेरा सबसे अच्छा 

गाइड बना रहे!!

हँसी मुस्कराहट के साथ चिंगारी भी 

ईमानदारी और कर्तव्यपरायणता का बोध ताउम्र साथ चलता जाए!!

चिलम चिल्ली वाला कोई स्वभाव ना हो 

मेरा,बस यही है चाह जीवन की!!

प्रेम से चीजों को और मजबूती से समझा पाऊँ और समझ पाऊँ केवल इति सी चाह !

स्वार्थ के संग परमार्थ भी बना रहे !!

 गाँव और शहर दोनों को स्पर्शीत 

करता हुआ दोनों का प्रेम पाता रहूं

बचपन की यादों से बँधा हुआ भविष्य रहे 

ग्राम ढकाइच की मिट्टी की सुगंध मन में 

बिहार बंगाल समेत पूरे भारत माता की 

जय जयकार का उद्घोष मन को जगाता रहे 

नफरती लोगों को प्यार और मोहब्बत से 

जीतने की ताकत मिलती रहे!! 

चाह नहीं ईर्ष्या में जलने की किसी से 

चाह नहीं क्रोध की अग्नि को ढोता जाऊँ 

शांत गांभीर्य सा मन किन्तु चिंगारी भी संग 

यही है चाह मेरे मन की.....

चाह नहीं हारने की नफरत वाले लोगों से 

चाह नहीं सीखने की भ्रष्टाचार वालों से 

चाह नहीं चोरों संग रहके भी चोर बनने की 

पैसों के डकैत बने सफेदपोश लोगों सा 

ना कभी बनने पाऊँ इति सी चाह है निज की..

  चाह नहीं उठने बैठने की झूठे लोगों संग !!

चाह मानवतावादी बने रहने की....

वसुधैव कुटुम्बकम केवल मुख की भाषा 

ना होके जीवन की धार का हिस्सा हो 

यही है अभिलाषा मन की.....

चाह नहीं झूठे और जुमलेबाजों को देखने की 

पुष्प की अभिलाषा जैसा 

चाह है खुद को समर्पित कर पाऊँ जिस रास्ते 

जाएं ईमानदार और अच्छे लोग अच्छा करने को !!

सफेदपोष चोरों से कोशों दूर यही चाह है मेरी 









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