शहर से गाँव की ओर
चल दिया एक भाई भूले बिसरे रिश्तों को छुने !
छु लेना भाई यही जीवन हैं !!
कभी एक दांत की रोटी खानेवाले किन्तु मिलने का
वक्त बड़ी मुश्किल मिल जाया करती है आज!!
यहां का नौकरी वाला जीवन भी देखना
किन्तु वहां बचपन से ही जुड़े रिश्तों को भी सहेज लो!!
दूर दूर रहते रहते और खुद की जिम्मेदारियों में मशगूल
हम इंसान केवल बीबी बच्चों तक ही सीमित
हो लिया करते है!!
कभी सोचो वो बचपन जब भाई संग खेलता रहा होगा
गाँव की गलियां रास्ते वो पेड़ पौधे वो खेत
तब के गुल्ली डंडा वाला गाँव अब कहाँ!!
और आज जब मुश्किल से वक्त निकल पा रहा
सही ही किसी ने बोला है हम मशीन से हो चुके है!!
डरते हुए ही घुसना भाई गाँव यूँ ही क्रोधित होगा
तुम्हारे उप्पर!!
शहरी लोगों से चिढ़ा चिढ़ा हुआ जो रहता है
गाँव हमलोगों के!!
भारी गुस्सा रहता है शहर उप्पर हमारे गाँव!!
नमन करते मिट्टी को माथे लगा लेना
पल भर ही सही सहला लेना गाँव को
शायद कुछ शांत हो जाए गुस्सा गाँव का!!!
जब भी कोई गाँव जाता दिखता है शहर से
शहर और गाँव का वाकयुद्ध यूँ ही आ जाता है मन मे!
उधर से जब आओगे शहर का कटाक्ष भी लेना झेल
चलो ये वाकयुद्ध यूँ ही चलने दो!!!!
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