घमण्डी और बेवकूफ़

सदा घमंड में चूर रहनेवाला बेवक़ूफ़ इंसान 

व्यंग्यात्मक हंसी और व्यंग्य को अपनी ताकत 

समझता रहा और जीवन मे चलता रहा !

सदा एक ईर्ष्या से ग्रसित अपने में मशगूल 

किन्तु समझता निज को सबसे बड़ा धर्मात्मा 

अरे मुर्ख राहगीर जिवन को खुलकर जी लेना 

खुद जैसा सबको समझ लेना या कहीं बेहतर 

अपने को भगवान या धर्मात्मा समझना छोड़ देना 

तुम भी एक आम आदमी हो!!

दो हाथ पैरों वाले तुम्हारी कोई औकात नहीं 

खुद को सबसे अच्छा सबसे बड़ा ज्ञानी 

दूसरों को छोटा छोटी जाति का छोटे धर्म का 

जैसा कीड़ा दिमाग में रखते हों!!!

इंसान को इंसान समझना ऐ घमंडी मनुष्य 

रिश्तों को कितना सहेज पाए हो वही असली धन है 

अपनी बीबी बच्चों के अलावा भी कुछ रिश्ते होत है 

लेना सहेज उनको रखना ध्यान उनका भी 

तभी ये मनुष्य जीवन सार्थक है!!!!

सच पूछो तो मनुष्य जीवन होत अकेला है 

रिश्ते नाते होने चाहिए होते है इंसानों संग 

किन्तु अकेला रहना शकुन देता है ना बहस 

ना प्रश्नों की बौछार ना व्यंग्य बातें !!!

इंसान अकेला आया है अकेला ही जाएगा 

यही सच है जिवन का!! 

फिर भी दो हाथ दो पैरों वाले कुछेक 

खुद को भगवान समझ लेते है.....

पैसा रुपया सब यही छोड़ जाओगे !!!

मेरे पास दो पैसा ही सही किन्तु वही मेरा है 

करोड़ रुपया होगा तुम्हारे पास वो तुम्हारा है 

यही सच है मनुष्य जीवन का!!

मेरा दुख मेरा ही रहेगा मेरा सुख भी मेरा ही 

कोई किसी का कुछ भी हरण नहीं कर पाता 

फिर काहे का ये व्यंग्य ढेरों प्रश्न ईर्ष्या दूसरों से 

हम केवल अपने कर्तव्य के मालिक ठहरे....

फल तो प्रभु की लीला है!!!!!






Comments

  1. झूठी दुनिया, झुठे लोग कि इनकी बातें भी झूठी,
    झूठे हैं इरादे भी और मुस्कुराहटें भी झूठी,
    बंधती है डोर प्यार की जिस विश्वास के धागे से,
    देखो तो पता चलता है वो डोर है टूटी,
    किस शख्स पर करें यकीन, समझ नहीं आता,
    इमारत तो है भरोसे की, मगर बुनियाद है झूठी,
    रिश्तों मे भी आ गया है स्वार्थ अब ऐसा
    साथ मिलने की, सारी उम्मीदें हैं छूटी,
    मुखौटे झूठे खुशियों के सबके चेहरों पर हैं,
    मगर अफ़सोस इनकी, सभी बातें हैं झूठी,
    कोई गैर नहीं आया था लूटने मेरी खुशी की दौलत
    ये तो मेरे अपनों ने मिलकर है लूटी,
    झूठी दुनिया, झूठे लोग कि इनकी बातें भी झूठी,
    झूठे हैं इरादे भी और मुस्कुराहटें भी हैं झूठी।

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