वाकयुद्ध


गांव बोला शहर से 

ओ  भाई तुम इतने गंदे कलुषित से क्यों 

तुम्हारी हवा इतनी गंदी क्यों।।

कितने लाड़ प्यार व नजाकत से पाल पोस के

 भेजता हु अपने बच्चों को शहर

कुछ ही सालो में तुम क्या से क्या कर देते हो

 उन प्यारे दुलारे मेरे बच्चों का।।

ऐ शहर बहुत इतराते हो निज के उप्पर

क्या है तुम्हारे पास जिसपे इतनी इतराहत

हुआ करती है तुम्हारे दिलो दिमाग मे।।

शहर बोला गांव से..

ऐ भिखमंगा से दिखनेवाला गांव

क्या नही है मेरे पास ये चमक दमक

सुंदर दिखते सड़क स्कूल अस्पताल

दौड़ती भागती लोगो की खुशहाल जिंदगी

पैसों की बारिश से लबालब लोग ।।

ऐ शहर मेरे भोले भाले बच्चों को बेईमान 

बना देनेवाले शुष्क जीवन करनेवाले

पैसों के पीछे दौड़ते दौड़ते खुद को भूल 

जानेवाले इंसान बना बहुत बड़ा अत्याचार 

किये जा रहे हो ऐ घमंडी शहर।।

पैसों के पीछे दौड़ते दौड़ते कैसे मेरे बच्चों को 

घूसखोर व भावना रहित बना देते हो

फिर भी इतराते हो घमंडी शहर।।

इतरा लेना जिस दिन मेरे जैसे साफ शुद्ध

हवा के झोंके चला लेना अपने यहाँ

इतरा लेना ऐ शहर जिस दिन मेरे जैसा 

प्रेम रस लोगों बीच फैला लेना।।

जिस दिन रिश्तों को हराभरा तरोताजा 

लेना कर उस दिन इतरा लेना खुद पे

इंसान को मशीन बना देनेवाला ऐ शहर

कैसे सो लेते हो इतना करके भी।।

शहर बोला गाँव को....

टूटे फूटे घर सड़क व अस्पताल विद्यालय

वाला गांव यही है तुम्हारी पहचान।।

पेड़ पौधे बगीचे तो मेरे यहाँ और भी सुंदर

चारो ओर सड़क ही सड़क चमक दमक

ही चारो ओर।।

इंसान इंसान का प्रेम कभी देख लेना आके...

प्रकृति क्या होती है कभी निहार लेना ऐ शहर आके मेरे यहाँ।।

कैसे इंसान जानवर व पेड़ पौधों का ताना बाना

 चलता है मेरे जैसे गांव में ।।।।

कैसे कैसे रिश्तों का ताना बाना हुआ करता था

नाना नानी घर मामा मामी घर आज तुमने कर दिया

वीराने उन रिश्तों नातों को ।।

बर्बादी की कहानी उन रिश्तों की तुम लिखे जा रहे ऐ शहर

वो भावुक रिश्ते प्यार वाले रिश्ते आज विरले हो गए

केवल पति पत्नी व बच्चों में सब सारा परिवार दिखता है

मेरे यहां तो बिस तीस चालीस लोगों की एक परिवार

किंतु सब तुमने खत्म कर डाला ऐ शहर।।

रुक जाओ ठहर जाओ सोच लो।।

ये बर्बादी वाली कहानियां लिख रहे तुम।।

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