आवाज़

 

आज गांव की वो यादें वो मिट्टी की महक

चिल्ला चिल्ला के पुकार रही आजा आजा

शहर की घुटन वाली हवा को छोड़के ..

ये चाटुकारिता व भागमभाग का जीवन

वो शहर के जीवन को छोड़ आजा 

नफरत व बेगाने का भाव यदि आ जाये

पैसे की खातिर बेईमानो को देखते देखते

यदि मन मे एक नफरत सी होने लगे 

तब शांत स्निग्ध गांव की मिट्टी मैं 

बाहें फैला इंतेज़ार करती मिलूंगी।।

चेहरे पे एक बेईमान भरी हंसी से यदि

मन विरक्ति से भर आये तब कर लेना याद 

मेरे को ओ मेरे आँचल में पलनेवाले

अहंकारियों को देखते देखते जब मन 

अजीज हो जाये तब याद कर लेना 

मैं वही गांव की तरोताजा हवा सदा

इंतेज़ार करती नजर आऊंगी।।

जब अपने रिश्ते भी शहर में इतने व्यस्त 

नजर आने लगे जब मिलने का वक्त भी ना हो 

तब गांव का आँचल हमेशा तैयार 

मिलेगा अपने आगोश में लेने को।।

भले ही पैसा कम हो मेरे आँचल में

किंतु शांत शीतल हवा के झोंके वैसे ही

जैसा बचपन मे हुआ करता था।।

मुख पे हंसी व भित्तर कल छल का 

आभास यदि होने लगे तब दूर ही रहना

ऐसों से और पुकार लेना मेरे को वत्स।।

जब वक्त ठहरना बंद कर दे तुम्हारे शहर में तब याद कर लेना मेरे को वत्स।।

मैं वही गांव वही हवा वही मिट्टी की महक

लिए इंतेज़ार करती मिलूंगी जिन जिनको 

पाल पोष के बड़ा किया अपने आँचल में।

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