एक दोस्त

 दोहज़ार दो में मिला था एक बन्दा 

लाल गमछा लपेटे पढ़ने की सनक लिए

मुझे भी प्रेरित करता रहा किंतु मेरा 

मन नही रम पाया पुनः उस पढ़ाई में

रहे होंगे अलग अलग वजहें।।

तब चार सौ वाले कमरे में रहता था

मैं होस्टल में तब रहता था ।।

समय चलता रहा वो डिग्री पे डिग्री लेता रहा

एक लड़की से इश्क़ में हारा हुआ भूलने की एक तडप

थी तब उसके दिलोदिमाग में ।।

प्रतिरोध वश कुछ कर गुजरने की एक सनक 

मैं भी कमोवेश ऐसे ही दर्द से निकला यहां था आया

छोटी तनख्वाह मिला करता था तब के दिनों

पांता भात खाता बहुत था उन दिनों वो।।

लड़ता रहा चिठी पे चिठी लिखता रहा 

अपना हक पाने की खातिर आफिस में

काहे का कोई सुनवाई उसका।।

डिग्री पे डिग्री लेता रहा आगे चलता रहा 

एक बार पढ़ाई से विमुख फिर कभी नही हो पाया

फिर शादी देखने कटक मुझे भी लेके गया

इस बीच बहन को भी नॉकरी दिलाया

लड़की देखा हुआ सबकी रजामंदी हुई

अपनी भी पढ़ाई करता आगे बढ़ता रहा

मैं तो अपनी दुनिया खुद से कल्पित करता रहा

आज मैनेजर बन गया वो कई लोग उसके अंडर

मैं अपनी दूसरी दुनिया मे कल्पित बढ़ता रहा 

समयाभाव खातिर नही मिल पाता ज्यादा 

अब उन दिनों जैसा ।।

बच्चे भी आ गए जीवन मे उसके भी बच्चे 

बीबी भी अच्छे नॉकरी लेके कोलकाता में

तब वेज में मशगूल रहनेवाला रोज मछली 

अंडा व चिकन खानेवाला बन गया।।

खूब अल्हारमस्ति हुआ होता था तब के दिनों

पता नही आज भी वही रूठना मनाने का 

चल रहा सिलसिला आज भी।।

पता नही आज भी लड़ता मेरे संग 

वही स्वभाव वही व्यंग्य वांण।।

वही  बाल मन आज भी उसका

किंतु मैं कबि रूपी मन वाला बनके रह गया।।

दर्द मिलता उसको कविता लिखके निकालने

की मानो एक कला मिल गयी हो जैसे 

चाहे वो आफिस की हो कोई बात या 

जो कोई दिल को मिला कोई दर्द।।

कोई सुंदर लगा वो भी लिख लो 

मन की आंखों से ही निहार लेने की 

एक कला पता नही कब जीवन में आ गयी।।

दोनों की कशमकश आज भी 

तब कुछ और आज कुछ और कशमकश।।

मैं ज्यादा सोचनेवला वो कम सोचनेवाला 

बिस सालो की ये यात्रा कब पूरी हो गयी

पता ही नही चल पाया ।।

वो पल दूसरे थे ये पल दूसरा है।।





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