अकेला

 आया था अकेला इस धरती पे

जाएगा भी अकेला फिर ये भागमभाग

ये लूट लो वो लूट लो ऐसा क्यों

ये अपना बना ले उसको छीन ले

ये आशा ये निराशा ये बिश्वास

कभी वो अविश्वास क्यों।।

अकेला इस जहां में रहना

ना कोई दर्द ना कोई शिकवा 

ना रहेगा किसी से आशा ना कोई निराशा

अकेला वाला जीवन था सुंदर

अपने से बातें कर मुस्कुरा लिया करता था तब

मन की बातें कविताओं में समेट प्रसन्न हो जाया 

करता था तब।।

इसका व्यंग्य वाण उसकी बातें

ये बोला ऐसे बोला ना था कोई झंझट

ऐ प्रभु इस जहां को बनानेवाले।।

ये नाराज वो नाराज होने का क्या है इलाज

अकेला जीवन लगता सबसे सुंदर जीवन

झेल लेंगे कभी तूफान भी आये तो

किंतु रोज रोज का तूफान रोज रोज की सफाई 

कौन देता फिरता होगा व कब तक  ऐ प्रभु।।

उसके साथ वो बैठा ये बोला वो बोला।।

बुढापा की दहलीज पे दस्तक देता हुआ 

फिर भी अनेको सवाल अनेको व्यंग्य वाण

अनेकों परिक्षा देते चलो सवाल पे सवाल।।

आखिर कब तक व क्यों ये सवाल

तब तो अकेला वाला जीवन ही अच्छा था प्रभु

ना कोई प्रश्न ना कोई व्यंग्य वाण ना कोई आशा

ना कोई निराशा एकदम शांत वाला जीवन था तब

पौधों से दोस्ती किया कोई सवाल नही

कोई व्यंग्य वाण नही कोई आशा नही

इंसानो से दोस्ती ढेरों सवाल ढेरों अविश्वास

ऐ प्रभु कैसे बनाया होगा हम इंसानों को।।




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