द्वंद जीवन का।।

 कौन हूँ मैं ११


जन्म हुआ पला बढ़ा

विद्यालय गया फिर और 

बड़ा हुआ समझदार हुआ 

ऐसा सभी बोले।।।

प्यार व स्नेह  घर के सबों का

दुख व तकलीफ भी देखा व झेला

परिवार में कशमकश भी रहा रिश्तों में

समय चलता रहा व जीवन भी 

छोटे से बड़े होते रहे ...

कब व कहाँ से कहाँ तक आ गया

बेसुध व मग्न चलता रहा।।

नए रिश्तों से भी मुखातिब होता रहा

बचपन से जवानी में आ गया

उल्टे सीधे अच्छे बुरे काम होते रहे

फिर भी जीवन चलता रहा

समय यूं ही बीतता गया।।

पैंतालीस साल कब आ गया 

समझ ही ना कभी आया।।।

ये करना वो करना यही चलता रहा

जीवन के भागमभाग में कभी रुकना 

हुआ ही नही कभी।।

समझ ही नही आया आज भी 

कौन हूँ मैं....

आज रात्रि के अर्धपहरी में बिस्तर 

पे बैठा यही पूछ रहा खुद से

कौन हूँ मैं क्या है ये जीवन

केवल अपने बच्चे अपना स्वार्थ

अपनी बीबी व जरूरतें।।

इसी का नाम जीवन है क्या

कभी एक बहस बीबी से तो

कभी एक डांट बच्चों को।।

सभी अपने जीवन मे दौड़ते भागते

कोई रेस चल रही हो जैसे।।

इत्मीनान और शांत मन से 

बात करने का भी समय ना हो जैसे

अजीब विडम्बना है जीवन का।।

आज भी ना समझ आया कौन हूँ मैं

बस चले जा रहा हु मग्न जीवन लीला में....

ये काम वो काम ये जरूरत वो जरूरत

नित्य प्रतिदिन की दौड़ जीवन का

मन यूं ही ऐसे ही बेचैन।।

इतना पैसा उतना पैसा

ये काम हुआ वो वाला बाकी रहा

माया मोह की इस जदोजहद में

पिसता हुआ एक परिंदा जैसा मैं

फिर भी नही मिलता उत्तर कौन हूँ

बुढ़ापे की दहलीज पे खड़ा हुआ मैं

दौड़े चला रहा अनवरत अभी भी

अब पहुचे तब पहुचे ।।

नही पता जाना है कहाँ।।

सभी व्यस्त है अपने अपनो में

मैं भी व्यस्त दौड़ता अपनो संग

फिर भी वही सवाल कौन हूँ मैं।।।

बचपन जवानी और बुढापा।।

बचपन मे मां पिताजी का प्यार

फिर जवानी में कइयों से इश्क़

की वो कहानियां।।

जैसे सबों की होती कहानियां है।।

आज भी मन वैसा ही व्यग्र व्यथित

पता नही क्या चाहिए मन को।।

कभी घर कभी कार्यालय।।

Comments

Post a Comment

Popular posts from this blog

श्रद्धांजलि

मनुष्य जीवन

Me and Guddu pundit