बुलन्द हौसले
वीर तुम बढ़े चलो धीर तुम बढ़े चलो
सामने पहाड़ हो या सामने तूफान हो
सामने नफरत की दीवार हो या चारो
मन मे अग्नि अपनी मंजिल की जलाए
वीर तुम चले चलो धीर तुम बढ़ते चलो
ना कभी हार ना कभी रुकने का नाम हो मन मे।।।
निडर होकर दहाड़ते हुए चलते चलो
प्रेम को हथियार बनाके मानवता की
मशाल लिए चलते चलो बढ़ते चलो
ना सोचना कभी कौन क्या सोचता है
खुद के बारे में खुद की राय बनाके
वीर तुम चलते चलो धीर तुम बढ़ते चलो
सोते जागते उठते बैठते खूब देखना सपने
फिर भागना उन सपनों के पीछे
सपना वही देखना जो मन को भाये।।
तिरस्कार को ही हथियार बनाके
खुद को प्रेरित करना वत्स
सकारात्मकता को ही अपना नजरिया
बनाके जीवन मे बढ़ते चलो चलते चलो
व्यंग्य हो या उपहास उड़ाती बातें
वीर तुम बढ़ते चलो धीर तुम चलते चलो।।
मनोज प्रधान
बहुत सुंदर जिवन प्रेरक प्रसंग और लेख
ReplyDeleteधन्यवाद
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