राखी।।

 ऐ वक़्त ठहर जरा आज रक्षा बंधन है

देख लूं याद कर लूं उन पलों को

देख लूं अपनी बहना को कैसी है

याद करने दो ऐ वक़्त उन पलों को

कितनी राखियों में अपनी बहना का हाल 

चाल ले पाया हूँ थोड़ा हिसाब कर लेने दो

बचपन के उन पलों को थोड़ा सहेजने दो 

बहुत दूर चले आये है ऐ वक़्त ।।।

कैसे बहन राखी बांधती थी फिर वो मिठाइयां फिर पंडित जी की राखियां

कितने मनोहर मीठे पल थे वो

आज ये भाग दौड़ माया मोह की जकड़न

फिर भी आज राखी है ।।

ऐ वक़्त आज बक्श दो 

दौड़ने भागने ना बोलो आज 

केवल बहन से बात कर उन यादों को

समेटने दो आज ऐ वक्त ।।

ठहर जा ..रहम कर ..ना दौड़ने बोलना आज।।।

दीदी कैसी हो आज राखी है

मेरा प्रणाम लेना ।।

दीदी आज कलाई पे तुम्हारी भेजी हुई 

राखी बांध उन पलों को याद कर रहा हूँ

याद है तुमको जब हम छोटे हुआ करते थे

बहुत मीठी यादें आज भी तरोताजा है मन मे।।।।

तब रिश्ते क्या होते है का ना था कोई ज्ञान

आज जब गांव की गलियां छोड़ कंक्रीट

रूपी जंगल से उन पलों को देखता हूँ

जमीन व आकाश का होता अहसास है।।

कैसे हम आज हो चुके बड़े है।।

माया मोह की जकड़न में कितने आगे 

निकल चुके है आज।।।

वाह रे जीवन वाह रे वक्त ।।

यही सोच रक्षा बंधन की खुशियों

को समेटने सहेजने की करता कोशिस आज  मैं।।

मनोज प्रधान

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